मई दिवस 2021 का घोशणा-पत्र

इस मई दिवस 2021 पर, सीटू

पूरी दुनिया के मजदूर वर्ग और मेहनतकश वर्गों के उन सभी लोगों को सलाम करता है, जो भारी व्यक्तिगत नुकसान झेल रहे हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर अर्थव्यवस्था को फिर से पहियों पर लाने और दूसरों के जीवन की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं।
कोविद-19 महामारी के कारण जान गंवाने वाले लाखों लोगों के परिवारों और दोस्तों के साथ शोक संवेदना व्यक्त करता है।

इस मई दिवस पर, सीटू

दुनिया भर में मजदूरों और कामकाजी जनता के साथ बिरादराना एकजुटता को व्यक्त करता है, जो एक ओर कोविद महामारी का मुकाबला बहादुरी से कर रहे हैं और दूसरी ओर आजीविका, अधिकारों और काम की परिस्थितियों पर शासक वर्गों और उनके सत्तासीन एजेंटों के हमलों से जूझ रहे हैं।

कोविद महामारी जो कि डेढ़ साल से जारी है, क्योंकि यह पहली बार 2019 के अंत में दिखाई दी जिसने 
पूँजीवादी व्यवस्था के बदसूरत, क्रूर और बर्बर चेहरे को उजागर किया है जो एक व्यवस्था के तौर पर, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद, अधिकांश जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने और उनके जीवन की रक्षा करने में विफल रही है; एक व्यवस्था जहाँ स्वास्थ्य नागरिकों का मूल अधिकार नहीं है, लेकिन केवल उन लोगों के लिए आरक्षित है जो इसे खरीद सकते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, भोजन तेजी से गरीबों की पहुँच से बाहर होते जा रहे हैं। महामारी के दौरान कामकाजी गरीबों की संख्या में वृद्धि हुई है। लाखों लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं। उन्नत पूँजीवादी देशों के साथ-साथ, दुनिया का सबसे धनी और सबसे शक्तिशाली देश, संयुक्त राज्य अमेरिका इस बात का एक शानदार उदाहरण है कि कैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल की उपेक्षा और निजी बीमा आधारित स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने के कारण महामारी से, हजारों रोके जा सकने वाली मौतें हुईं। भारत आज उन्ही के साथ में खड़ा है।

आज, कोविद के टीके कुछ उन्नत देशों द्वारा नियंत्रित और सुव्यवस्थित किए जा रहे हैं। कई गरीब देशों को टीकों के उपयोग से वंचित किया जा रहा है।
कोविद-19 महामारी के अनुभव ने फिर से समाजवादी व्यवस्था की श्रेष्ठता को उभारा है, जो पूँजी से अधिक जनता को प्राथमिकता देता है। कोविद-19 के प्रसार को प्रभावी रूप से रोका जा सका है और सार्वभौमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल और शीघ्र सरकारी हस्तक्षेप प्रदान करके समाजवादी देशों में मृत्यु दर में कमी आयी है। चीन, वियतनाम और उत्तर कोरिया ने इस बीमारी पर काबू पाने और जनता के स्वास्थ्य, जीवन और आजीविका की रक्षा करने का रास्ता दिखाया है। चीन और वियतनाम भी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने में सफल रहे हैं।

चीन ने फरवरी 2021 में अंतिम 9 करोड़ 89 लाख 90 हजार ग्रामीण निवासियों को गरीबी से निकालकर गरीबी पर ‘पूर्ण विजय’ हासिल कर ली है। यह संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडा में सतत विकास के लिए निर्धारित गरीबी उन्मूलन लक्ष्य के निर्धारित समय से लगभग 10 साल पहले पूरा किया गया है। यह उस स्थिति में और भी अधिक महत्वपूर्ण है, जहाँ यूएनडीपी के अनुमान के मुताबिक, महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव के परिणामस्वरूप 2030 तक दुनिया भर में 20 करोड़ 70 लाख लोग अत्यधिक गरीबी के गर्त में गिर सकते हैं।
अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा अमानवीय नाकाबंदी और प्रतिबंधों के बावजूद, क्यूबा ने एकजुटता की एक अनुकरणीय कार्रवाई में महामारी से निपटने के लिए, न केवल अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में, बल्कि इटली जैसे उन्नत पूँजीवादी देशों में दुनिया भर के 51 से अधिक देशों की सहायता के लिए डॉक्टरों और पेशेवर स्वास्थ्य कर्मियों की अपनी टीमों को भेजा है। सीटू की माँग है कि दुनिया भर में निस्वार्थ चिकित्सा सेवाओं के लिए क्यूबा के डॉक्टरों को नोबेल पुरस्कार दिया जाए।

जबकि उन्नत पूँजीवादी देश अन्य देशों की जनता को उनके द्वारा विकसित किए गए टीकों को उपलब्ध कराने के लिए तैयार नहीं हैं, चीन 53 देशों को कोविद वैक्सीन की आपूर्ति कर रहा है। क्यूबा भी ईरान, वेनेजुएला और अन्य जरूरतमंद देशों को टीके की आपूर्ति कर रहा है।

को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी और अमेरिकी साम्राज्यवाद के बहुआयामी साजिशों का सामना करते हुए समाजवादी व्यवस्था को बनाए रखने और बचाव के लिए समाजवादी देशों की जनता का सीटू गर्मजोशी से अभिनन्दन करता है। इस मई दिवस पर, सीटू समाजवादी देशों के साथ अपनी एकजुटता दोहराता है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा विशेष रूप से लैटिन अमेरिका, फिलिस्तीन, मध्य-पूर्व और एशिया प्रशांत क्षेत्र को लक्षित करते हुए अपनी दबंगई कायम करने के लिए बढ़ते आक्रामक शड्यंत्रों को चिंता के साथ सीटू नोट करता है। यह विकासशील देशों पर अपने आर्थिक और राजनीतिक अधीनता के लिए दबाव बढ़ा रहा है। अभीे हाल ही में लक्षद्वीप के तट पर पानी भारत की सहमति के बिना ही अमेरिकी युद्धपोतों के सातवें बेड़े द्वारा भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में घुसपैठ है, जो भारत की संप्रभुता के लिए गंभीर चुनौती है। सीटू इस तरह के साम्राज्यवादी अहंकार की निंदा करता है और भाजपा सरकार से ऐसे अमेरिकी घमंड के खिलाफ हमारे देश के मजबूत विरोध दर्ज करने की माँग करता है

सीटू विभिन्न देशों की जनता के साथ, विशेष रूप से लैटिन अमेरिकी देशों में अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों के खिलाफ और लोकप्रिय चुनी हुई सरकारों के बचाव में अपनी एकजुटता को व्यक्त करता है। यह राष्ट्रपति मादुरो की लोकप्रिय लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिकी साजिशों के खिलाफ लड़ने वाली वेनेजुएला की जनता को एकजुटता का संदेश देता है। फिलिस्तीन की जनता को अपनी मातृभूमि के अधिकार की लड़ाई में सीटू उनके साथ एकजुटता में खड़ा है। यह इजरायल की आक्रामकता और फिलिस्तीन में अपनी बस्तियों के निरंतर विस्तार की दृढ़ता से निंदा करता है और 1967 की सीमाओं और पूर्वी यरुशलम को अपनी राजधानी के रूप में उनकी मातृभूमि की माँग का समर्थन करता है। देश में लोकतंत्र को बहाल करने की माँग के साथ विरोध करने पर सैन्य तख्तापलट और म्यांमार में सैन्य जुंटा द्वारा किए गए हमले की सीटू निंदा करता है।

हमारे देश में भाजपा सरकार महामारी और सम्बन्धित प्रतिबन्धों का उपयोग ‘‘अभूतपूर्व अवसर’ के रूप में करते हुए अपने नवउदारवादी एजेंडे को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाने के लिए, भू-पूँजीवादी वर्ग की मुनाफाखोरी की लालसा को संतुष्ट करने के लिए, आम जनता की आजीविका और जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है। इस अवधि के दौरान भाजपा सरकार ने मत विभाजन की माँग करने वाले सांसदों को निलंबित करते हुए तीन कृषि कानूनों पारित किया है; जब संसद में पूरा विपक्ष अनुपस्थित था, तब तीन लेबर कोड पारित किए। यह सार्वजनिक क्षेत्र के थोक निजीकरण की अपनी योजना के साथ आगे बढ़ रहा है। ‘आत्मानिर्भर (आत्मनिर्भर)’ भारत के भ्रामक और कपटपूर्ण नारे के तहत, भाजपा सरकार पूरे देश की धन-सम्पदा, प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ धन-सम्पदा के वास्तविक रचनाकारों मजदूरों और किसानों तक को देशी-विदेशी बड़े काॅरपोरेटस् के हाथों गिरवी रख रही है। देश और इसकी जनता को 19वीं सदी की औपनिवेशिक शोशणकारी स्थितियों में धकेलने की कोशिश कर रही है।
इस नवउदारवदी निजाम के तहत देश में वैक्सीन निर्माणकर्ता तीन प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइया बंद की जा रही हैं, वैक्सीन निर्माण का कार्य अब निजी कंपनियों के लिए छोड़ दिया गया है, जिसका भारत सरकार खरीदारों में से एक है। कभी वैक्सीन निर्माण में अग्रणी भारत में अब कोविद के टीकों की भारी कमी है। यह टीके के उत्पादन को कम करने और टीकों तक सार्वभौमिक पहुँच प्रदान करने में विफल रहा है। इसने कवरेज को विस्तार देने के लिए कई राज्य सरकारों के साथ-साथ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया है। इसके बजाय, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने राज्य सरकारों के साथ दोषपूर्ण चालबाजी का सहारा लिया।

एक साल पहले देश ने अपने मजदूरों की मेहनत से दशकों से समृद्ध होने वाले नियोक्ताओं क द्वारा त्याग देने के बाद, भूख और बेघर होकर मौन विरोध में अपने परिवारों के साथ पैदल चलते हजारों हजार प्रवासी मजदूरों के दिल टूटने वाली तस्वीरें देखीं हैं। इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कर्स एक्ट, 1979, जो प्रवासी मजदूरों को कुछ सुरक्षा प्रदान करता था, अब व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तों पर कोड के तहत अनिवार्य रूप से निरस्त कर दिया गया है, लेकिन अधिकांश सुरक्षात्मक प्रावधानों को लागू करता है। प्रवासी मजदूरों पर राष्ट्रीय नीति का मसौदा उनके श्रम अधिकारों या औद्योगिक संबंधों से संबंधित मामलों पर कुछ भी नहीं है। इसका जोर ‘वोटिंग को सक्षम करने के लिए एक तंत्र’ स्थापित करना है जिसे ‘राजनीतिक समावेश’ के रूप में दावा किया जाता है। यह उनके वोटों पर नजर रखने के लिए एक संदिग्ध कसरत के अलावा और कुछ भी नहीं है।

कोविद की एक और तेजी से फैलती हुई लहर के कारण देश में तबाही मची हुई है और तालाबंदी की संभावना उनके चेहरे पर मंडरा रही है, करोड़ों प्रवासी मजदूर अपनी आँखों के सामने अपना जीवन ढहते हुए पा रहे हैं। लॉकडाउन के एक और दौर के डर से, हजारों प्रवासी मजदूर फिर से अपने मूल स्थानों की ओर जा रहे हैं।

महामारी के दौरान पारित श्रम संहिता ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देने के बहाने बड़े कॉरपोरेट द्वारा मजदूरों के बेरोकटोक शोषण के उपकरण हैं, जो बीजेपी सरकार द्वारा बड़े कॉरपोरेटों को उपहार में दिए जा रहे हैं। एक ओर श्रम संहिता मूल कानूनों के नियोक्ताओं द्वारा अभी तक के अवैध उल्लंघन को वैध बनाती है; दूसरी ओर वे अपने मूल ट्रेड यूनियन और श्रम अधिकारों का दावा करने के लिए मजदूरों की सामूहिक कार्रवाइयों का अपराधीकरण करते हैं। यहाँ तक कि मई दिवस के पर्यायवाची सर्वमान्य रूप से स्वीकार्य ‘‘आठ घंटे के कार्य दिवस’’ को भी कमजोर किया जा रहा है। मजदूरों के पास मौजूद संगठित ट्रेड यूनियनों और सामूहिक कार्रवाई के उनके हथियारों को भी नकारा जा रहा है। श्रम संहिताओं का अर्थ मजदूर जनता पर दासता की स्थिति को लागू करना है, आक्रामक और बर्बर पूँजीवादी शोषण के खिलाफ सामूहिक विरोध के मजदूर वर्ग द्वारा उनके कड़े संघर्षों से जीते हुए सभी अधिकारों से वंचित करना, गंभीर रूप से कमजोर करने और कुचलने का एकमात्र उद्देश्य है।

सार्वजनिक क्षेत्र, जो देश की धन-सम्पदा है, भाजपा के अंतरंग मित्र कॉरपोरेट को सौंपा जा रहा है। इस अवधि के दौरान जब करोड़ों मजदूरों ने अपनी नौकरी और आमदनी खो दी, जब उन्हें और उनके परिवारों को भूखे रहने के लिए मजबूर किया गया था, जब भारत की जीडीपी 7ः की गिरावट का अनुमान लगाया गया था, गौतम अदानी की सम्पत्ति दोगुनी हो गई। वह विश्व में 48वें सबसे अमीर व्यक्ति बनने के लिए 20 सीढ़ी ऊपर चढ़ गए हैं और भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं। मुकेश अम्बानी की सम्पत्ति में 24ः की वृद्धि हुई और वे दुनिया के 8वें सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। ऑक्सफैम ने बताया कि महामारी के दौरान भारतीय अरबपतियों की सम्पत्ति में 35ः की वृद्धि हुई। यह परिघटना जनता की कीमत पर देश के संसाधनों, सरकारी खजाने की लूट की सुविधा और सरकारी तंत्र द्वारा बड़े-कारोबारी देशी-विदेशी कॉरपोरेटस् के पक्ष में पूरी वित्तीय व्यवस्था को लूटने की बर्बर नीतियों को उजागर करती है। कुल मिलाकर, दुनिया भर के कॉरपोरेट/बड़े-व्यवसायी वर्ग ने इसी समय के दौरान अपने धन को अभूतपूर्व रूप से कई गुणा कर लिया, जब वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद नकारात्मक हो गया। भारत सहित कई देशों में बेरोजगारी विस्फोटक, नवउदार पूँजीवादी नीतियों द्वारा अर्थव्यवस्था की रोजगार-अवशोषण क्षमता के व्यवस्थित विनाश को उजागर करने वाले विस्फोटक अनुपात तक पहुँच गई है।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जहाँ हमारे देश की आम जनता अपना पैसा बचाकर रखते हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के जीवन और सामान्य बीमा कम्पनियां, जहाँ आम लोग अपनी अल्प बचत को विपरीत परिस्थितियों से बचाने के लिए निवेश करते हैं, को ऐसे कॉरपोरेट दिग्गजों को सौंपने की कोशिशें की जा रही हैं। रक्षा उत्पादन, रेलवे, दूरसंचार, नागरिक उड्डयन, बंदरगाहों, बिजली, इस्पात, खदानों आदि को विदेशी एकाधिकार सहित निजी कम्पनियों को दिया जाना तय है। निजीकरण के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, कल्याण-योजनाओं जैसी सेवाओं सहित पूरी अर्थव्यवस्था को लक्षित किया जा रहा है। इनसे देश के रोजगार पैदा करने वाली उत्पादक और सेवा क्षमताओं पर गंभीर नकारात्मक और विनाशकारी असर पड़ता है। हमारी उत्पादन क्षमता,, ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर, विडंबना से नष्ट हो रही है। ‘ना खाऊगां, न खाने दूंगा’ अब पीएमओ की भागीदारी के साथ हस्ताक्षरित राफेल सौदे में बिचोलियों और कमीशन के भुगतान के बारे में फ्रांसीसी मीडिया में नवीनतम खुलासे के साथ नग्न रूप से सामने आया है।

केवल उद्योग और सेवाएं ही नहीं; मोदीनीत भाजपा सरकार ने भी हमारी कृषि को कॉरपोरेट के पूर्ण नियंत्रण के लिए खोल दिया है। तीन कृषि कानूनों का उद्देश्य छोटे किसानों के प्रभुत्व वाले हमारे कृषि क्षेत्र के कॉरपोरेटी अधिग्रहण को सुविधाजनक बनाना है। वे कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा देते हैं, लाभकारी कीमतों और खरीद सहित नियमों को वापस लिया है जो किसानों की रक्षा करते हैं और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय खाद्य बाजारों की सीमाओं तक पहुँचाने के लिए है। यह सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को खत्म करने की ओर ले जाएगा, जिससे हमारी जनता, विशेष रूप से गरीबों की खाद्य सुरक्षा को खतरा होगा। अधिकांश किसानों के लिए भूमि से बेदखली का खतरा होगा।

सीटू, मजदूर वर्ग, किसानों और मेहनतकश जनता के सभी तबकों को भाजपा सरकार की इन मजदूर-विरोधी, किसान-विरोधी, जन-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी नीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष के लिए बधाई देता है। दिल्ली सीमाओं पर ’काले’ कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का विरोध न केवल पाँच महीनों से जारी है, बल्कि पूरे देश में मेहनतकश जनता के सभी तबकों से भी समर्थन प्राप्त किया है। किसानों को विभाजित करने के लिए अपने सभी टूल किटों को लगाने के बावजूद, उन्हें बदनाम करना, झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह करना, लोगों का ध्यान आकर्षित करना आदि के द्वारा, भाजपा सरकार, संघर्ष को कमजोर करने में सफल नहीं हो सकी है। किसान अपना एकजुट संघर्ष जारी रखे हुए हैं। सीटू उनके साहस और दृढ़ संकल्प को सलाम करता है। पूरे देश में हजारों कार्यकर्ताओं को एकजुटता के साथ जुटाकर उनके संघर्ष का हिस्सा बनने पर गर्व करता है।

सीटू भी अपने अधिकारों और कामकाजी परिस्थितियों पर बड़ी पूँजी के हमले और शासन में उनके वर्तमान प्रतिनिधि, मोदीनीत भाजपा सरकार सेे अधिकारों को बचाने के लिए अपने मजबूत और निरंतर संघर्ष के लिए मजदूर वर्ग को बधाई देता है। महामारी और उससे जुड़े लॉकडाउन के कारण आन्दोलनों और गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं, मजदूर वर्ग ने सरकार की मजदूर-विरोधी, जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने के लिए हर अवसर का उपयोग किया। गंभीर महामारी के बावजूद भी लॉकडाउन के चरम के दौरान अपनी छत और बालकनियों से अपनी आवाज उठाते हुए, यह धीरे-धीरे संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए आगे बढ़ा और 26 नवंबर को एक सफल हड़ताल पर चला गया। सीटू को इन विरोध प्रदर्शनों को शुरू करने में अपनी भूमिका पर गर्व है और भारी प्रतिक्रिया के लिए मजदूरों को बधाई देता है। कोयला मजदूर, इस्पात श्रमिक, बैंक और बीमा कर्मचारी, निजी संगठित क्षेत्र के मजदूर, योजना वर्कर्स और लगभग सभी क्षेत्रों के लाखों मजदूर संघर्ष के रास्ते पर हैं।

हमारी मेहनतकश जनता, मजदूरों और किसानों के दो प्रमुख वर्गों के बीच बढ़ती एकजुटता, जो इस देश की धन-सम्पत्ति का उत्पादन करती है, बहुत महत्व का विषय है। सीटू हमेशा मजदूरों और किसानों की ऐसी एकजुटता और एकता विकसित करने के प्रयास करता रहा है। महामारी के बीच में, मजदूरों और किसानों ने न केवल जारी रखा और अपनी माँगों पर अपने संघर्ष को तेज किया, बल्कि जानबूझकर अपनी कार्रवाहियों में तालमेल बनाने की कोशिश की है और शारीरिक रूप से एक-दूसरे की कार्रवाहियों में भाग लिया। सीटू का मानना है कि मजदूरों और किसानों की ऐसी एकता को मजबूत बनाना और जनता के व्यापक तबकों को जोड़कर संयुक्त संघर्ष को उच्च स्तर तक ले जाना न केवल नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ बल्कि शोषणकारी पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान करेगा।

सीटू पूरे देश में मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों के अन्य तबकों की एकता को मजबूत करने का आग्रह करता है, साम्प्रदायिक और जातिवादी ताकतों के विभाजनकारी तंत्र, शासक वर्गों के हितों की सेवा करने के लिए जनता की एकता को बाधित करने पर तुला हुआ है। सीटू मजदूरों, किसानों और मेहनतकश जनता के सभी तबकों की एकता को मजबूत करने और उनके हितों की रक्षा और राष्ट्र को बचाने के लिए संघर्ष को तेज करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराता है।

सीटू, भाजपा सरकार द्वारा उसकी नीतियों के प्रति असहमति और विरोध को कुत्सित तौर तरीकों से दबाने के प्रयासों की निन्दा करता है। जनता के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों और संसदीय मानदंडों का उल्लंघन किया जा रहा है। भाजपा सरकार अपने प्रशासन के तहत यूएपीए, एनएसए आदि जैसे निश्ठुर कानूनों और ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई आदि अपनी मशीनरी और दिल्ली पुलिस आदि को अपनी नीतियों का विरोध और उसकी कार्रवाहियों का विरोध करने वाले लोगों को डराने, धमकाने, गिरफ्तार करने, जेल भेजने और उत्पीड़न करने के लिए इस्तेमाल कर रही है। सैकड़ों छात्रों, महिलाओं, पत्रकारों, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मानव एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं आदि को यूएपीए और एनएसए के तहत गिरफ्तार किया गया है और बिना जमानत दिए भी सालों से जेल में बंद हैं। यह खेदजनक है कि सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्थान भी सरकार की सोच को ही बढ़ा रहे हैं। पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के मामले में हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि चुनाव आयोग भी उसकी ही लाइन का अनुसरण कर रहा है।

मजदूरों और अन्य मेहनतकश जनता पर पूँजी और सरकारों में उसके प्रतिनिधियों के आक्रामक हमले अकेले भारत के लिए विशिष्ट नहीं हैं। कोरोना महामारी से पहले से लगातार बढ़ रहे आर्थिक संकट के बीच, दुनिया भर के शासक वर्ग मजदूरों और कामकाजी जनता को निचोड़कर और प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक सम्पत्तियों और सेवाओं पर नियंत्रण हथियाने के द्वारा अपने मुनाफे और धन-सम्पदा को अधिकतम करने की कोशिश कर रहे हैं। श्रम कानूनों में बदलाव से मजदूरों के कड़े संघर्षों से जीते गए अधिकारों पर अंकुश लगाकर, विशेष रूप से संगठित और सामूहिक सौदेबाजी के उनके अधिकार पर, कई पूँजीवादी देशों में लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले हो रहे हैं। शासक वर्ग अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए दक्षिणपंथी ताकतों के विकास को बढ़ावा दे रहे हैं और धर्म, जाति, नस्ल, क्षेत्र आदि के आधार पर जनता को विभाजित करते हैं। बदनाम नवउदारवादी मॉडल की विफलता के बावजूद, व्यवस्थागत संकट के चलते जनता पर बोझ लादने के अलावा पूँजीवादी व्यवस्था के पास बाहर आने का कोई रास्ता ही नहीं है। जो प्रतिकूल साबित होने के लिए ही बाध्य हैं।

इस पूँजीवादी व्यवस्था के लगातार बढ़ रहे आर्थिक संकट की प्रतिक्रिया के रूप में, शासक वर्ग पूरी तरह से अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था के पूरे शासन को केंद्रीकृत और अधिकृत करने की कोशिश कर रहा है। वे एक स्पष्ट फासीवादी इरादे के साथ सभी लोकतांत्रिक घटकों को नष्ट कर रहे हैं। उद्योग का थोक निजीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सहित सेवाएं, खनिज संसाधन और बुनियादी ढाँचा स्थापित करने के लिए अनियमित निजी नियंत्रण, हमारे देश की अर्थव्यवस्था और बाजारों को विदेशी एकाधिकार कॉरपोरेटों के लिए खोलना और हमारे कृषि के कॉरपोरेटी अधिग्रहण को बढ़ावा देना आदि इस हताशा की प्रतिक्रिया के सभी घटक हैं, पूँजीवादी संकट, बड़े अमीरों के द्वारा कॉरपोरेट लाभ को अधिकतम करने और धन-सम्पदा को जुटाने का इरादा है।

श्रम संहिता के माध्यम से मजदूर वर्ग के अधिकारों पर हमला, लोकतांत्रिक अधिकारों पर क्रूर हमले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असंतोष, विरोध और प्रतिविरोध आदि पर, संवैधानिक प्रावधानों को रौंद कर, संसदीय मानदंडों को दरकिनार करते हुए, राज्य सरकारों के अधिकारों पर हमले करके मौजूदा संघीय ढाँचे को समाप्त करना, सभी इस सत्तावादी परियोजना के अभिन्न अंग हैं। जनता की एकता को बाधित करने के लिए सांप्रदायिक, विभाजनकारी मुद्दों का उपयोग करना और देशी-विदेशी दोनों तरह के मुट्ठी भर कॉरपोरेटों के हितों की सेवा के लिए उनके संघर्ष को कमजोर करना भी इसी उद्देश्य के साथ उनके राजनीतिक एजेंडे का एक हिस्सा है।

हमारे देश और दुनिया भर में मजदूर अपने हितों की रक्षा के लिए व्यवस्था की विफलता का एहसास कर रहे हैं। भाजपा सरकार का वास्तविक ‘कॉरपोरेटी अधीनता’ वाला चरित्र जनता द्वारा तेजी से समझा जा रहा है। इस समझ को और बड़ा करना होगा। अब मजदूरों के विशाल जनसमूह और अन्य मेहनतकश जनता के बीच जागरूकता पैदा करने का समय है, जो अपने दिन-प्रतिदिन के मुद्दों और केंद्र में आने वाली एक के बाद दूसरी सरकारों द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के बारे में जनता को बताना है; अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने में उनकी मदद करनी है; उन्हें अपने दोस्तों के साथ एकजुट होने और अपने दुश्मनों के साथ लड़ने के लिए प्रेरित करें।

जनता पर व्यापक चैतरफा हमले के मद्देनजर, अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव और समग्र रूप से राष्ट्रीय अखंडता, एक वर्ग उन्मुख मजदूर वर्ग द्वारा लड़ाई को इन हमलों के चरित्र की व्यापक समझ के आधार पर ही करना पड़ता है। शासक वर्ग, अपने सभी भावों में, एक को दूसरे से जोड़ता है। मजदूरों और जनता के अधिकारों और सम्मान की रक्षा, उनकी आजीविका, लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों की रक्षा, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और संसाधनों और सभी लोगों की एकता की रक्षा करने के लिए जनता के साथ-साथ मजदूर वर्ग की एकजुट लड़ाई होनी चाहिए। ।

इसके लिए पूँजीवादी व्यवस्था के अंर्तनिहित शोषणकारी चरित्र, उसकी अमानवीय व्यवस्थाओं और उसे बढ़ावा देने वाली राजनीति को उजागर करने के लिए दृढ़ और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। यह मई दिवस पर हम इस कार्य को सही तरीके से करने का संकल्प लें।
इसलिए, इस मई दिवस पर, सीटू हमारे देश और दुनिया भर के सभी मजदूरों और मेहनतकश जनता से अपील करता है किः

कोविद-19 के खिलाफ मुफ्त सार्वभौमिक टीकाकरण के साथ-साथ मुफ्त सार्वभौमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल की माँग करें
मजदूरों और मेहनतकश जनता की आजीविका और बुनियादी अधिकारों पर पूँजीपतिवर्ग के घातक हमलों के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट हों।
जन-समर्थक विकल्प के लिए एकजुट हों और संघर्ष करें।
मजदूर वर्ग और जनता को विभाजित करने के शासक वर्गों के सभी प्रयासों को विफल करने के लिए एकजुट हों और संघर्ष करें

मई दिवस जिन्दाबाद
मजदूर वर्ग की एकता जिन्दाबाद
मजदूर-किसानों की मैत्री जिन्दाबाद
समाजवाद जिन्दाबाद
पूँजीवाद हो बर्बाद

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